फट्टी चद्दर पर  पैंबद नहीं, नई चद्दरों पर गलीचा बिछाने की तैयारी

          सब करें अपने-अपने पार्षदों से सवाल!
डबवाली दर्पण  
     सत्य की भूख सबको है लेकिन जब सत्य परोसा जाता है तो बहुत कम लोगों को इसका स्वाद अच्छा लगता है।  


इन्हीं शब्दों के साथ ‘डबवाली दर्पण’ सत्य की राह पर चलते हुए आमजन के समक्ष इस बात को उजागर करने का प्रयास कर रहा है कि जनता के खून पसीने की कमाई को किस कद्र भ्रष्टाचार के माध्यम से इधर से उधर करने का प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप राशि खर्च की जा रही है लेकिन सोचने वाला विषय यह है कि यह राशि आखिर आती कहां से हैं मुख्यमंत्री के यहां कोई खजाने नहीं भरे हुए हैं यदि उनके कोष में कुछ है तो वह भी जनता की जेब से ही निकला हुआ है। मुद्दे की बात की जाए तो बीते मंगलवार को नगर परिषद की हुई आम बैठक में जिस तरह से दस करोड़ राशि से किए जाने वाले कार्यों का  प्रस्ताव रखा गया वह आमजन के गले नहीं उतर रहा हैं। इसलिए इस बैठक में लिए गए निर्णयों का दूध का दूध और पानी का पानी करने की बेहद आवश्यकता है। हुडा विभाग द्वारा बसाए गए ऐरिया में साढ़े पांच करोड़ की लागत से जो सडक़े बनाए जाने का प्रस्ताव पारित नगर परिषद की बैठक में किया गया। उस पर अब अधिकारियों से लेकर इस बैठक में शामिल पार्षदों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि जनस्वास्थ्य विभाग द्वारा कोर्ट परिसर के साथ वाला मार्ग, नई सब्जी मंडी रोड और एफसीआई गोदामों से होकर गुजरने वाले मार्ग पर लगभग 18 करोड़ की लागत से डाली गई गहरी मल योजना के दौरान तोड़ी गई सडक़ का निर्माण किया जाना है और इस पर नगर परिषद ने साढ़े पांच करोड़ की राशि जारी करने का निर्णय लिया है। जन स्वास्थ्य विभाग इस बात को स्वीकार कर रहा है कि गहरी मल योजना का काम पूरा हुए तीन माह से अधिक का समय हो गया है और इस दौरान शहर को नई सीवरेज लाइन से जोड़ दिया गया है। पब्लिक हैल्थ द्वारा गहरी मल योजना के लिए तोड़ी गई अच्छी भली सडक़ों का निर्माण का जिम्मा नगर परिषद पर आ गया है।
एक विभाग विकास के नाम पर अच्छी हालत में सडक़ों को तोड़ डालता है और दूसरा विभाग उसे बनाने के लिए प्रस्ताव पारित करने में जुट जाता है। सवाल यह नहीं है कि आखिर हुडा की सडक़ों को बनाने के लिए नगर परिषद द्वारा साढ़े पांच करोड़ की राशि जारी क्यों की गई? सवाल तो यह है कि इस बैठक में केवल और केवल हुडा की सडक़ों को बनाने के लिए ही अधिक रूचि क्यों दिखाई गई जबकि शहर की गलियां पूरी तरह गड्डों में तबदील हो चुकी हैं। शहर की 90 गलियों के प्रस्ताव अनेक बार बैठक में रखे गए लेकिन एक भी गली का प्रस्ताव पारित होकर नहीं आया। उस पर जोर देने की बजाए मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा को जल्द पूरा करने के चक्कर मे10 करोड़ की राशि से होने वाले कार्यों को प्रमुखता से पेश किया गया। 
सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि इस बैठक में शामिल 8 पार्षदों के अपने ही वार्ड की गलियां पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं लेकिन उन्होंने एक बार भी इस पर अपनी आवाज बुलंद करने की जरूरत नही समझी। शहर के सभी वार्ड वासियों को अपने-अपने पार्षदों से यह सवाल जरूर करना चाहिए तभी सत्य उजागर हो पाएगा। 

वार्ड 20 में टूटी गलियो सहित अवैध कालोनियों का कारोबार भी जोरों पर

डबवाली दर्पण   नगर परिषद की आम बैठक में शामिल 8 पार्षदों में से वार्ड 20 के  नगर पार्षद रविन्द्र बिंदु भी शामिल थे। उनकी भी इस प्रस्ताव के प्रति सहमति थी जबकि इसके विपरित उनके वार्ड की लगभग सभी गलियां जहां गड्डों में तबदील हो चुकी हैं तो वहीं उनके वार्ड में अवैध काटकर प्लाट बेचने का गोरखधंधा भी पूरे यौवन पर है। यहां एक विशेषता यह है कि काटी जा रही अवैध कालोनियों में सीवरेज लाइन भी डलवा दी गई है। पार्षद महोदय न तो अपने वार्ड की गलियां बनवाने में कोई रूचि ले रहे हैं और न ही अवैध कालोनी काटने वालों के खिलाफ किसी तरह का कदम उठा रहे हैं।


ऊपर के अधिकारियों के पास रूकी हैं फाइलें:बिंदू
डबवाली दर्पण   वार्ड 20 के नगर पार्षद रविन्द्र बिंदू से इस विषय पर बातचीत की तो उन्होंने बताया कि उनके वार्ड के अनेक गलियां पूरी तरह दूरूस्त है कुछ गलियों का निर्माण कार्य अभी होना है। इसके लिए प्रस्ताव डाले गए हैं। वहीं अनेक गलियों के टैंडर होने के बाद उच्चाधिकारियों के फाइलें रूकी हुई है। ऊपर के अधिकारी डाले गए प्रस्तावों के प्रति गंभीर नही है। अवैध कालोनी के बारे में कहा कि इस मामले में एफआईआर हो चुकी है।

ठेकेदार और पार्षदों में मिलीभगत की आशंका
डबवाली दर्पण   पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पिछले लंबे समय से नगर परिषद में कमीशनखोरी का खेल खुलकर खेला जा रहा है। कुछ पार्षद ऐसे हैं जो अधिकारियों से मिलीभगत कर अपने चहेते ठेकेदारों के टैंडर आवदेन करवाते हैं और फिर पूरा जोर लगाकर उसे टैंडर दिलवा देते हैं। ठेकेदार से कमीशन के साथ-साथ हिस्सेदारी भी की जाती है। सूत्र बताते हैं कि ठेकेदार अपनी फर्म के नाम से ठेका लेता है और उसमें मौखिक रूप से पार्षद को हिस्सेदार के रूप में शामिल कर लिया जाता है ताकि बिल पास करवाने में कोई दिक्कत न आए।