दम तोड़ रहा है इंसानियत, पे्रम और भाईचारे
डबवाली दर्पण
नरेश अरोड़ा
आज जब हम अपने आस-पास की स्थिति को नजदीक से देखते हैं तो पाते हैं कि हम कितने असभ्य और असंवेदनशील हो गए हैं। सिर्फ हम अपने बारे में सोचते हैं और हमें अपनी चिंताएं हर वक्त सताती हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि समाज के प्रति हमारी कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। देश में ऐसा कोई बड़ा जन आंदोलन भी नहीं है, जो संवेदनहीनता के लिए जनता में जागृति लाए। राजनीतिक दल और नेता लोगों को वोट और नोट कब्जाने से फुर्सत मिले, तब तो इन मनुष्य जीवन से जुड़़े बुनियादी प्रश्नों पर कोई ठोस काम हो सके। गत दिनों सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और संदेश वायरल हुआ जिसमें एक गर्भवती महिला को किसी शादी में भारी-भरकम लाइट उठाए बड़ी तकलीफ के साथ चलते हुए दिखाया गया है। इसे देखकर आपका भी सिर शर्म से झुका होगा, आत्मा कराही होगी, खुद की उपलब्धियों पर शर्मिंदगी महसूस हुई होगी। जीवन से खिलवाड़ करती एवं मनुष्य के प्रति मनुष्य के संवेदनहीन-जड़ होने की इन शर्मनाक एवं त्रासद घटनाओं के नाम पर आम से लेकर खास तक कोई भी चिंतित नहीं दिखाई दे रहा है, तो यह हमारी इंसानियत पर एक करारा तमाचा है। इस तरह समाज के संवेदनहीन होने के पीछे हमारा संस्कारों से पलायन और नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीनता ही दोषी है। हम आधुनिकता के चक्रव्यूह में फंसकर अपने रिश्तों, मर्यादाओं और नैतिक दायित्वों को भूल रहे हैं। समाज में निर्दयता और हैवानियत बढ़ रही है। ऐसे में समाज को संवेदनशील बनाने की जरूरत है। इस जरूरत को कैसे पूरा किया जाए, इस संबंध में समाजशास्त्रियों को सोचना होगा। अकसर हम दुनिया में नैतिक एवं सभ्य होने का ढिंढोरा पीटते हैं, जबकि हमारे समाज की स्थितियां इसके विपरीत हैं, भयानक हैं।
हमारे समाज की सोच की बात करें तो किसी आगजनी में फंसे लोग हों या अन्य दुर्घटनाओं के शिकार लोग जब सहयोग एवं सहायता के लिए कराह रहे होते हैं, तब हमारे संवेदनहीन समाज के तथाकथित सभ्य एवं समृद्ध लोग इन पीडि़त एवं परेशान लोगों की मदद करने की बजाय पर्सनल फोन से वीडियो बनाना जरूरी समझते हैं। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नया भारत बनाने की बात कर रहे हैं तो सबसे पहले इंसान बनाने की बात करनी होगी, इंसानियत की बुनियाद को मजबूत करना होगा। किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति, किसी गर्भवती महिला, किसी दिव्यांग व्यक्ति की सहायता हम सब की जिम्मेदारी है। आप सक्षम हैं और ऐसा कोई दृश्य आपके सामने से गुजर रहा हो तो उसे एक दिन की मजदूरी निकालकर दे दें, उससे कहें कि तुम आराम करो, आज की रोटी के पैसे हमसे ले लो। यह कोई दया नहीं है, यह कोई समाधान भी नहीं है, फिर भी ऐसे हालात में आपकी संवेदनाओं का जागना जरूरी है। कोई औरत शौक से अपने सिर पर बोझ नहीं उठाती है, रोटी मजबूर करती होगी उसे। किसी गरीब को जूठन में से दो निवाले पेट की भूख को शांत करने के लिए चुनने पड़ें, ये स्थितियां हमारे विकास पर, हमारी सभ्य समाज व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्न हैं। कितना दुखद है कि आजादी के इतने सालों बाद भी हमें ऐसे दृश्य देखने पड़ते हैं। यह दृश्य किसी भी सभ्य समाज के चेहरे की नकाब उतार लेती है। सरकारों के सारे दावों और तामझाम को एक पल में मटियामेट करके रख देती है। समाज में बहुत-सी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जिन्हें देखकर तो ऐसा लगता है कि समाज बड़े गहरे संकट में फंस चुका है। समाज की बुनावट में कोई गहरी खोट है। इंसानियत, प्रेम और भाईचारा दम तोड़ रहा है। कुछ दिन पहले भी एक सडक़ दुर्घटना में घायल छात्र को एक लडक़ी ने अपना दुपट्टा बांधकर उसका बहता खून रोकने की कोशिश की। वह तब तक घायल छात्र के साथ रही, जब तक उसके दोस्त ऑटो लेकर नहीं पहुंचे। ऐसे राहगीरों का अनुकरण जरूरी है। समाज के संवेदनहीन होने के पीछे हमारा संस्कारों से पलायन और नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीनता ही दोषी है। आज हम ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहां हर इंसान फेसबुक और अन्य सोशल साइटों पर अपने दोस्तों की सूची को लंबा करने में व्यस्त है। घंटों-घंटों का समय फेसबुक और व्हॉट्सअप पर दूरदराज बैठे अनजान मित्रों से बातचीत में बिताया जाता है लेकिन अपने आसपास के प्रति अपने दायित्व को नजरादांज करके। समाज के ऐसे धनवान भी हैं, जो अपने आपको दानवीर एवं परोपकारी कहते हैं, अपनी फोटो खिंचवाने, किसी धर्मशाला पर अपना नाम बड़े-बड़ेे अक्षरों में खुदवाने के लिए लाखों-करोड़ों का दान कर देते हैं। लेकिन ऐसे तथाकथित समाज के प्रतिष्ठित लोग, राजनेता, धर्मगुरु कितने भूखों की भूख को शांत करते हैं, कितने गरीब बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं, कितनी विधवाओं का सहारा बनते हैं? शायद उत्तर शून्य ही मिलेगा। फिर समाज को सभ्य, संस्कारी एवं नैतिक बनाने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को क्यों दी जाती है? ऐसे लोगों के योगदान से निर्मित होने वाला समाज सभ्य, संवेदनशील, सहयोगी एवं दयावान हो ही नहीं सकता।


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